आखिर मै क्या बनूगा ,

सूरज….. नहीं  मैं

ना वो आग रही अब मुझमें नाही शोलों सा दहेक ताहु ,

चाँद…. नहीं मैं

किशी और की रोशनी पे एतराना हमारी फितरत नहीं

तारा….. नहीं  मैं जिसे अपनी रोशनी दिखाने बहुत दूर तक जाना 

 नदी….. नहीं जनाब वोतों ऊपर से नीचे बहती है हमारी चाहत तो उचाई तक पहुंचने की है 

समंदर….. नहीं इतनी गहराई भी क्या  की कोई हमारी गहराई समझे भी ना 

ज़मीन….. नहीं हमे हमारा बटवारा कतेय मंजूर नहीं 

हवा….. नहीं इतना तेज़ बहना शायद हमे रास नहीं आयेगा 

बादल….. कभी काला कभी सफ़ेद कभी बरसना कभी गरजना तो कभी यूहि चुप चाप रेहना ये भला क्या बात हुयी ,



हाँ….. आसमान जैसा बनूँगा

कभी काला कभी नीला कभी गेरुए रंग का

चाँद-तारे- सूरज- हवा- बादल सब समेट लूगा, ज़मीन भी देखू गा, समुंदर की गहेराई  भी समझूंगा

जिस को जितनी चाह है उसका उतना कोई बटवारा नहीं ,सब के लिए एक ..रंग अनेक और हाँ रहुगा अनंत……..

– अjay

- written by  (Ajay Rathod)                            - Editing  by Avinash
-Painting by RINI

 

माप

 

 

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दुनिया की विशालता देख, मैं बहुत परेशान हुआ
थोड़ा हैरान, थोड़ा निर्बाध हुआ

प्रकृति ने तभी एक छोटा उपाय दिया
थोड़े और ज़्यादा का भेद दिया
जीवन की महानता का नन्हा-सा एक मान दिया

उन्होंने कहा कि एक छोटा सा उपाय करना
स्वस्थ रहने के लिए छोटा एक माप रखना
अपने आप को व्यक्त करने के लिए छोटे मीठे शब्द रखना

मन प्रसन्न हो, मैंने भी खुद के चित से कहा
चलो आज एक छोटा कदम लेते हैं
परिणाम से हटकर एक कदम बाएं और फिर दाएं लेते हैं

यह एक अद्भुत बात बना देगा
लय और ताल का जादू यह
गीत और नृत्य के साथ सब कुछ सही राह पर ला देगा

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मुझे माप की सुंदरता का एहसास हुआ
मानो खुद को मैं तभी प्राप्त हुआ
मैंने पक्षियों को कुछ करीब से देखा
बिना किसी नाप से, दृश्य की विशिष्टता को देखा

देखा खुद का छोटा रूप
जब दिख रहा था प्रकृति का विश्व-स्वरुप
अपने कर्त्तव्य को पूर्ण करने से पहले
लगने लगा मुझे यह अनुमान अनूप

मुझे बराबर भ्रम हुआ
इस मान, इस माप का मुझ पर ऐसा रहम हुआ
परिणाम की इच्छा भूल, सीमाओं को त्याग
उपाय को अपनाया मैंने | सारे माप छोड़ कर फिर जीवन की डोर को फिर बढ़ाया मैंने

अब न विलम्ब करो, सामान्य लक्ष्य नहीं यह
गाना और नृत्य करने के लिए एक उपाय ले आओ
यदि सूर्य आज अस्त और कल फिर से आता है
कल की अनिश्चितता में खुशी और नृत्य की सुगमता लाओ

आओ इस संसारिक धारणा के पुराने उपाय को भूल जाते हैं
और शुद्ध भावनाओं के अनोखे सागर में गोता लगाते हैं
मानवीय माप को आज छोड़ कर
विश्वरूप ग्रहण कर लेते है

इस दुनिया की अस्थायीता सीखकर
आध्यात्मिक दुनिया के अनोखे सौंदर्य को पीकर
इस क्षण का आनंद लेने के उपाय को ले आओ

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ऐसे उपाय के बिना जीवन क्या है
जहा माप का कोई खेल न हो
चिरंजीवी हो या हो एक दिन के योद्धा
माप बिना उस सत्य परिणाम को ले आओ

 

 

 

Writtten by Avinash

Lot of editing and correction by Rini

Photos by Rini

कश्मकश

 

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अजीब, मुझे अक्सर लगता है कि मैं यात्री बन गया हूँ ।

अपनी पसंद से नहीं, बल्कि किसी के खेल से

एक कठपुतली, जिसके पास कहने के लिए कुछ नहीं है

मेरा मालिक धागे चलाता और मैं चलता रहता हूँ।

कभी-कभी पूर्वानुमान गति में, कभी-कभी मैं दौड़ने लगा हूँ ।

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ऐसे ही एक दिन मुझे लगा कि मैं स्वतंत्र हूँ क्योंकि कुछ धागे मेरे पास हैं।

फिर भी मुझे पता है कि वे संभवतः गति को नियंत्रित करते हैं।

मैंने सोच-विचार किया कि क्यों मुझे इन धागे को काटने की जल्दी है

लेकिन फिर प्रकृति ने मुझे आपकी योजना के बारे में बताया

क्यों ये चलना फिरना मुझे नियंत्रित लगता है ?

क्या यह महज मेरी धारणा है

या मेरी संकीर्ण सोच मुझे ऐसा महसूस कराती है

 

क्या मैं गुलाम हूँ?

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इस तरह के एक पल में मैंने खुद को समर्पित कर दिया

न आवेश में किया, न ही मैंने कोई त्याग किया

लेकिन अपने विश्वास में, मैंने यह अभ्यर्पण किया।

अब मुझे लगता है कि मैं सभी आयामों में आगे बढ़ता हूँ ।

मैं इस दुनिया में स्वतंत्र हूँ, हालांकि लोग कह रहे हैं कि धागे अब भी हैं

मैं कहता हूँ कि धागे तो केवल खेलने के लिए होते हैं

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अब मेरा दिल पृथ्वी, आकाश और समुद्र पर घूम रहा

घाटियों में गहरी, जहां कोई भी नहीं देख सकता था

कि मेरी भूमिका में, मैंने आपका पालन करने के लिए

आत्मसमर्पण किया है, मैंने अपने सभी प्रयासों में।

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Written by Avinash

Edited and translated in Hindi by Rini

Photos by Avinash